Friday, 13 July 2012

सुरंदे के संगीत पर अपनी जान वारने वाला राजा



'surando' photo courtesy : asanjokutch.com 
सिंध, कच्छ और राजस्थान  का प्राचीन लोक-वाद्य है सुरंदो. लकड़ी पर सुन्दर नक्क़ाशी, घोड़े के बालों से बने तार और किनारे पर रंगबिरंगे  धागों और ऊन से की गयी सजावट. सुरंदे में छः तार होते हैं - पांच स्टील के और एक तांबे का, और हर तार का एक अलग नाम होता है. इस वाद्य को सारंगी की तरह ही बजाया जाता है. बढ़िया सुरंदा, सागौन की लकड़ी से बनता है. इस पर मोर के पंख के आकार की सुन्दर नक्क़ाशी की जाती है और चटकीले रंगों से इसकी सुन्दरता और बढ़ जाती है. कमाल का साज़ है सुरंदा. सुरंदा वादक दुर्लभ होते जा रहे हैं. भारत और सिंध में सुरंदे के गिनेचुने कलाकार ही बचे हैं. भारत से स्वर्गीय सिदिक जत और सिंध से मुहम्मद फ़कीर मुहाणों, सुरंदा उस्तादों में माने जाते थे. कच्छ के बन्धुओं मुस्तफा अली जत और उस्मान सोनू जत का नाम, बेहतरीन सुरंदा वादकों में गिना जाता है. 


Bijal aur Raidiyach
सुरंदे की बात निकलती है तो बीजल और राइदियाच याद आते हैं. एक था बीजल और एक था राइदियाच. बीजल एक गवैया और रायदियाच, गिरनार झूनागढ़ का राजा. सिंध-कच्छ की प्रसिद्ध लोक कथा  'सोरठ राइदियाच' में बीजल चारण ने यही साज़ बजाकर राजा राइदियाच का मन मोह लिया था और ईनाम में उनका सिर माँगा था. और रानी सोरठ के लाख समझाने पर भी, बीजल से किये हुए वायदे अनुसार राइदियाच ने स्वयं अपना सिर क़लम कर इस कलाकार के आगे धर दिया! रानी सोरठ ने अपने पति की जलती चिता में कूदकर जान दे दी. मजबूरी में किये हुए अपने इस गुनाह से बीजल भी बहुत शर्मिंदा और दुखी था. पश्चाताप करते हुए उसने भी प्राण त्याग दिए. अब न ऐसा कोई बीजल है और न ऐसा कोई राइदियाच. 

 'सोरठ राइदियाच' की प्रसिद्ध लोक कथा आप यहाँ पढ़ सकते हैं :

http://www.museindia.com/viewarticle.asp?myr=2011&issid=39&id=2819

 
और पेश है सुरंदे की प्यारी धुन, कलाकार हैं मुहम्मद फ़कीर मुहाणों. बशुक्रिया यूट्यूब  

Tuesday, 10 July 2012

सचल सरमस्त - इश्क कहता है, नहीं, मस्ती में आ



अक्ल और इश्क़..
सचल सरमस्त का एक कलाम और बैत आपको पढ़वाया है कुछ समय पूर्व, परन्तु आज सचल का कलाम खोजते तब सुखद आश्चर्य का अनुभव हुआ जब पीटीवी के एक प्रोग्राम की लिंक मिली. सूफी काव्य पर आधारित 'सफ़र-अल-इश्क'! बकौल लिंक, यह सीरीज़ पारंपरिक और आधुनिक गीत-संगीत का मिश्रण है. लोक, पॉप, क़व्वाली, काफ़ी, धमाल, कत्थक, माइम आदि का 'फ्यूज़न'! और यहाँ मुझे सचल का एक बहुत ही बढ़िया कलाम मिला, सारा रज़ा खान की आवाज़ में - 'अक्ल कहती है कि आ हस्ती में आ, इश्क कहता है, नहीं, मस्ती में आ, . आप भी सुनिए :)


'sama' (sufi whirling) by Mitra Benejad, Tehran (Iran)
कलाम की लिंक :
http://www.youtube.com/watch?v=gslBS-ePPDk


Kalaam: Aqql Kehti Hai K Aa Hasti Mei Aa,
Singers: Sara Raza Khan,
Kalaam: Sachal Sarmast (Translation), 
Music Composition: Khurram Latifi & Salman Adil,
Arrangements: Arif Mani,
Director of Photography: Farrukh Lodhi,
Set Design: Syed Zawar Shah,
Edited by: Khurram Latifi,
A Presentation of PTV Islamabad Center.


बशुक्रिया : खुर्रम लतीफ़ी, डाइरेक्टर-प्रोड्यूसर ''सफ़र-अल-इश्क', पीटीवी 
चित्र बशुक्रिया : Mitra Benejad, Tehran (Iran)

Monday, 9 July 2012

आओ राणा रहो रात.. शाह लतीफ़ का 'मूमल राणो' नूरजहाँ की आवाज़ में


सिन्धी लोक कहानी 'मूमल राणो' ..


Photo Courtesy : The Sketches! Music Band from Hyderabad, Sindh.

मीरपुर माथेलो के राजा नन्द को शिकार करते जंगली सूअर का एक जादुई दांत हासिल हुआ जो पानी सोख लेता था. राजा ने उसकी मदद से अपना सारा खज़ाना नदी के पेट में छिपा दिया. इत्तिफाक से इस बात की भनक एक तांत्रिक को पड़ गई. एक दिन जब राजा महल से बाहर था, वह तांत्रिक आया और अपनी बीमारी के इलाज के लिए सूअर का दांत ज़रूरी बताकर मदद की गुहार लगाईं. राजा की सबसे छोटी और सबसे सुन्दर बेटी मूमल को उस पर दया आ गई और उसने वह दांत ढूंढकर तांत्रिक को सौंप दिया. जब राजा नन्द वापस आया और उसको साडी बात पता चली तो वह मूमल पर बड़ा नाराज़ हुआ. तब सबसे बड़ी और चतुर बेटी सूमल ने पिता से वायदा किया कि खोये खज़ाने से भी कई गुना अधिक खज़ाना जोड़कर देगी. सूमल का अगला क़दम था काक नदी के किनारे पर तिलिस्मी 'काक महल' का निर्माण करवाना. और फिर यह मुनादी कि जो भी इस महल के हर तिलिस्म को पार कर मूमल तक पहुंचेगा, उसको पायेगा वरना अपना सारा धन, माल गँवाएगा. मूमल को पाने कई राजा, राजकुमार आये पर असफल हुए और सब कुछ लुटा बैठे. इस तरह सूमल पिता से किये वायदे अनुसार खज़ाना बढ़ाती रही.  उमरकोट के राजा हमीर और उसके तीन वजीरों ने भी अपनी किस्मत आज़मानी चाही जिसमें राजा हमीर का वीर और चतुर वजीर राणा मेंधरा कामियाब हुआ..


राणा मेंध्रो (महेंद्र) तिलिस्मी 'काक महल' को पार कर राजा नन्द की सबसे प्यारी सुन्दर बेटी मूमल तक पहुँचता है और उस से ब्याह रचाता है. राजा हमीर अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाता और बदला लेने की तरकीब सोचता रहता.  राणा रोज़ रात को ऊँट पर चढ़कर उमरकोट से मीरपुर माथेलो आता था, मूमल से मिलने.  राजा हमीर ने ईर्ष्यावश अपने वजीर महेंद्र को नज़रबंद करवा दिया ताकि वह मूमल से मिलने न जा पाए. पर राणा ने अपना नियम नहीं तोड़ा पर एक रात उसे आने में देर हो गई. मूमल की बहन सूमल ने जब अपनी छोटी बहन को उदास देखा तो हंसी ठिठोली करते हुए वह राणा के कपडे पहनकर आ गई. मूमल मुस्कुराने लगी और दोनों बहनें बतियाती हुई सो गयीं. रात के किसी पहर राणा आया, मूमल को किसी ग़ैर मर्द के साथ सोया जान बहुत दुखी हुआ. उसे बेवफा समझ वापस लौट गया. अपनी छड़ी वहीँ छोड़ आया. सुबह जब मूमल उठी तो राणे की छड़ी देख उसे अंदेशा हुआ कि राणा को ग़लतफ़हमी हुई है. मूमल ने राणा को संदेसे भेजे पर वह नहीं आया. वह इंतज़ार करती रही. आखिर भेस बदलकर राणे से मिलने गई, उस से दोस्ती भी कर ली. जब राणा पर मूमल का भेद खुल गया तो वह और नाराज़ हो गया. मूमल सहन नहीं कर पाई और आग में जलकर अपनी जान दे दी. राणा को पता चला तो वह भी मूमल के मार्ग पर चल पड़ा..  मूमल के प्रेम और इंतजार को शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई ने 'सुर मूमल राणो' में पिरोया है.  शाह ने जिस अंदाज़ में कहा है.. उस अंदाज़ में यह गाथा आप तक पहुँचाना मेरे बस का नहीं.. कुछ क़तरे और सतरें बुनती चलूंगी फिर भी.

राणा की राह तकती मूमल कहती है कि राणा, तुम लौट आओ, मेरे साथ रहो, तुम्हारे ऊँट को मैं चन्दन खिलाऊँगी..  

शाह की वाई 
आउ राणा रहु रात, तुहिंजे चांगल खे चन्दन चारियाँ .
रातियाँ डीहाँ रूह में, तन तुहिंजे जी तात
तुहिंजे चांगल खे चन्दन चारियाँ.
वेठी नित निहारियाँ, अचीं जे पिर्भात 
तुहिंजे चांगल खे चन्दन चारियाँ.
मूंखे आहे मेंध्रा, वाई तुहिंजी वात
तुहिंजे चांगल खे चन्दन चारियाँ.
अदियूं! शाह लतीफ़ चए, डातर डीन्दुम डात.
तुहिंजे चांगल खे चन्दन चारियाँ.
आउ राणा रहु रात...
(सुर 'मूमल राणो', दास्ताँ आठवीं)


हिंदी अनुवाद  :

आओ राणा रहो रात,  तेरे चांगे को चन्दन चराऊँ 
रात और दिन रूह में, तुम्हें पाने की आस
तेरे चांगे को चन्दन चराऊँ 
बैठी राह निहारूं, आओ तो हो प्रभात 
तेरे चांगे को चन्दन चराऊँ 
मुझे तो है मेंधरा, बस तुम्हारी याद
तेरे चांगे को चन्दन चराऊँ 
बहनों! शाह लतीफ़ कहे, दाता पर है आस
तेरे चांगे को चन्दन चराऊँ...
आओ राणा रहो रात... 

वाई - गाया जाने वाला सिन्धी काव्य-रूप 
चांगा - ऊँट 

अनुवाद की कोशिश : विम्मी सदारंगानी 

पुरानी सिन्धी फिल्म 'मूमल राणो' में शाह की लतीफ़ की यह 'वाई', मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ ने गाई है. इस लिंक पर सुनी जा सकती है http://www.youtube.com/watch?v=aQVuLXxsEbI

Sunday, 8 July 2012

एक सिन्धी बालगीत :)


आज एक सिन्धी बालगीत, अनुवाद और विडियो सहित.  'सो डेम्बो, सो डेम्बो', 'जो खीर पिए, सो वीर थिए', 'वाह रे तारा' जैसे कई बालगीत हैं जो गुदगुदाते हैं, कुछ न कुछ अच्छा सिखाते हैं. हम भी जब बच्चे थे तो बार-बार गाया करते थे. ऐसा ही एक गीत है 'पैसो लधुम पट तां'. एक कड़ी से दूसरी कड़ी जुडती जाती है. जितना आगे बढ़ाना चाहो, बढ़ाते जाओ..

'Little Shadow Dance' courtesy : Debbie Gonville Miller

मूल सिन्धी गीत :

पैसो लधुम पट तां,
पैसे वर्तुम गाहु.
गाहु डिनुम गाइँ खे
गाइँ  डिनो खीर.
खीर डिनुम अम्मां खे
अम्मां डिनो लोलो.
लोलो डिनुम कांव खे
कांव डिनो खंभु.
खंभु डिनुम राजा खे
राजा डिनो घोड़ो.
चढ़ी घुम, चढ़ी घुम चन्दन फटाको
जिए मुहिंजो काको.
काको वेठो माड़ी-अ ते
विछूं लगुस दाढ़ी-अ ते.
अम्मां वेठी मूढ़े ते
गुल हणास जूडे ते.


हिंदी अनुवाद :

इक पैसा मिला ज़मीन से 
पैसे से ली मैंने घास.
घास दी गाय को
गाय ने दिया दूध.
दूध दिया मैंने अम्मां को
अम्मां ने दिया 'लोला'.
'लोला' दिया कौवे को
कौवे ने दिया पंख.
पंख दिया मैंने राजा को
राजा ने दिया घोड़ा.
चढ़ घूमूं, चढ़ घूमूं, चन्दन पटाखा 
जियें मेरे काका.
काका बैठे छज्जे पर
बिच्छू ने काटा उनकी दाढ़ी पर.
अम्मां बैठी मूढ़े पर 
फूल लगाऊं उनके जूड़े पर.


लोला - मोटी-सी मीठी रोटी, जिसे गुड या शक्कर के पानी से बनाया जाता है, खूब मोयन डालकर.  

अनुवाद : विम्मी सदारंगानी 

video song courtesy : Ms. Koshi Lalvani

Monday, 2 July 2012

बहुत दिनों बाद.. गुनो सामताणी (Guno Samtaney) की कहानी 'प्रतिध्वनि'



सिन्धी कहानी और गुनो सामताणी

1947 के बाद सिन्धी जाति की तरह सिन्धी साहित्य भी एक कड़ी से दूर होकर दूसरी कड़ी से जुड़ा। उस पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव भी हुए, विभिन्न विचारधाराओं और वादों का प्रभाव भी हुआ। उत्तर-विभाजन स्थितियों का असर काफ़ी गहरा और तेज़ था। विभाजन दर्द में डूबी और फिर प्रगतिवाद की धारा में अटकी सिन्धी कहानी को लाल पुष्प, मोहन कल्पना और गुनो सामताणी (जिन्हें सिन्धी साहित्य जगत ने ‘त्रिमूर्ति’ नाम दिया) ने ‘शख़्स’ की तलाश  में लगाया और वह, नई कलात्माकता को छूने के क़ाबिल हुई। गुनो सामताणी, सिन्धी कहानी को सशक्त  करने वाला ऐसा नाम, जिसके बिना सिन्धी कहानी अधूरी होती। गुने की रचनाओं की संख्या अधिक नहीं है पर उनकी छाप बहुत गहरी है। उन्हें अपने पहले ही कहानी संग्रह ‘अपराजिता’ पर 1972 में साहित्य अकादमी अवार्ड प्राप्त हुआ। 
लेखक आलोचक हरीश वासवाणी के अनुसार, गुनो सामताणी वह कहानीकार है जिसने सिन्धी कहानी की  'संस्कारशीलता' में अपना योगदान दिया...  इस विवाद का महत्व नहीं है कि गुनो क्लासिकल या रोमानी  लेखक है या जदीद । मुसीबत यह है कि गुने का कलाकार, उसके कहानीकार पर हावी है। प्रभावशाली शब्दचित्र, सूक्ष्म दृष्टि, फि़क्र, भीतर तक छू जाने वाली और स्पंदित करती मंज़रकशी, सचेत शब्दबोध और ‘एक्ज़ीक्यूशन’ की महारत गुने की खू़बियाँ हैं। गुने ने सिन्धी कहानी को 'पौलिश्ड‘ ‘जेंटलमैन’ चेहरा दिया है। 


गुनो सामताणी की कहानियों में से मेरी प्रिय कहानी है ‘पड़ाडो’ अर्थात् ‘प्रतिध्वनि’। क्या होता है जब भारत विभाजन - भारत की स्वतंत्रता के कुछ वर्षों बाद सिन्ध से आई सलमा, भारत में बस चुके ‘साईं’ से मिलती है... कहानी के बारे के कुछ कहने के बजाय बेहतर होगा कि आप स्वंय यह कहानी पढ़ें। 


प्रतिध्वनि

- गुनो सामताणी

बहुत अधिक ठंड थी। कोहरा, पेड़ों की डालियों में मकड़ी के जाले सा अटका था। सर्दी की सुबह की धूप, उस जाले में अटककर स्वंय को छुड़ाने की कोशिश में तड़पकर, थककर, ज़मीन पर आ पड़ी थी। हुमायूँ के मक़बरे का तेज फीका पड़ गया था। यों लग रहा था मानो मक़बरा, ठंड से बचने के लिए खु़द में ही सिकुड़ गया हो। टूरिस्ट काफ़ी संख्या में थे। पर फिर भी, वायुमंडल में अलग अलग भाषाओं की आवाज़ें होते हुए भी, भाती-सी ख़ामोशी थी। मक़बरा देखने का समय बहुत कम था, सो टूरिस्टों के क़दम तेज़ तेज़ भाग रहे थे। कैमेरा ‘क्लिक’ की आवाज़ से अपने अस्तित्व के होने का संकेत देकर, ख़ामोश हो जा रहे थे। देखते ही देखते टूरिस्टों के समूह बन गए। कुछ बाहर, दूर जमुना को निहार रहे थे, कुछ मक़बरे के दरवाज़े और गुंबद की बुलंदी का अंदाज़ा लगा रहे थे, कुछ गाईड द्वारा न जाने कितनी बार दोहराए हुए, अंको और तथ्यों का लेक्चर सुनते, देखते, कुछ हल्का आश्चर्य अभिव्यक्त कर रहे थे।
अचानक! जोर से, बहुत अचानक! काफ़ी ज़ोर से, एक औरताना आवाज़ ‘हा.... आ... हा... आ...’ गूँज उठी। आवाज़, अपनी गर्मी से, जम चुकी सर्दी को पिघलाते हुए, ऊपर, ऊपर गुंबद से टकराकर, वापस नीचे शहंशाह की क़ब्र से ठोकर खाकर, दीवारों से फिसलती, एक प्रतिध्वनि बनकर, गूँज उठी. हा... आ... हा... आ... आ...
यों वैसे, हुमायूँ के मक़बरे के भीतर किसी का आवाज़ करना, प्रतिध्वनि का गूँजना, सैलानियों के लिए एक अहम अनुभव में शामिल है। पर उस वक्त , शीत, जमे हुए वातावरण में, गंभीर अंकों-तथ्यों के बीच, उस आवाज़ और उस आवाज़ से हुई प्रतिध्वनि ने लोगों को चौंका दिया। कुछ का चौंकना, मुस्कराहट में बदल गया; कुछ की भृकुटियां तन गईं, कुछ के चेहरों पर आश्चर्य  चिन्ह था। पर्यटकों की आँखें हमारी ओर उठ गईं थीं - और सलमा, कुछ झेंपकर, सहमकर, उलझकर, झेंप और उलझन को भगाने के लिए ज़ोर से हँस पड़ी। हँसी की एक न टाली जा सकने वाली प्रतिध्वनि... मैं संकोच से सिकुड़ गया जैसे सलमा की इस हरक़त के लिए मैं जिम्मेदार था, जैसे इस आवाज़ के कारण, उसकी हँसी के कारण हुई प्रतिध्वनि के शोर से, शहंशाह  की नींद में ख़लल पड़ने और उनके जाग जाने का ख़तरा हो। और फिर सैलानियों की इल्ज़ामी निगाहें - मैं सलमा को बाँह से पकड़कर, खींचता हुआ जल्दी बाहर निकल आया।
++

‘तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था’
‘पर साईं, गुंबद के नीचे प्रतिध्वनि तो हर कोई सुनना चाहता है’
‘फिर भी... तुम बच्ची तो नहीं हो। और इसके अलावा...’
‘इसके अलावा? क्या?’
‘इतने सारे लोग हैं, कई तो विदेशी भी हैं। क्या सोचते होंगे कि यह सिन्धी...’
मैंने बात आधे में ही छोड़ दी। दरअसल बात पूरी हो चुकी थी। देशी-विदेशी अनेक जातियों के अनेक लोग और उनके बीच हम दो सिन्धी - एक सिन्ध से यहाँ घूमने आई हुई, और दूसरा मैं दिल्ली के ‘नगर’ में ‘बसा हुआ’ सिन्धी - तुलना तो स्वाभाविक ही थी। और इस तुलना में, तुलना के आखिरी नतीजे में, हम सिन्धी कहाँ टिकेंगे ?
सलमा का चेहरा सख़्त हो गया। एक पल के लिए उसके चेहरे की सभी रेखाएं, जिनमें उसकी हल्की और अचानक से हँसी में बदल जाने वाली मुस्कान भी शामिल थी, जम गईं।
उसने धीरे से कहा, ‘ओह, आइ एम सॉरी, साईं’
++

इस ‘साईं’ खि़ताब की भी एक दास्तान है।
लगातार चार बच्चों की असमय मृत्यु के बाद मेरे पैदा होने पर, मेरी लंबी उम्र के लिए परिवार वालों ने पाठ पूजा रखवाई थी। ब्राह्मण ने दक्षिणा लेने के बाद कहा था, ‘आप बहुत खुशनसीब  हैं, हमारे गुरू ने आपके घर जन्म लिया है।’ इससे अधिक और आशीर्वाद क्या हो सकता था। 
बस, तब से मेरा नाम ‘गुरू’ पड़ गया। मेरा असली नाम तो जैसे सभी भूल गए।
मेरे पिता के बहुत गहरे दोस्त थे नूर मुहम्मद शाह। दोनों घरों में काफ़ी नज़दीकी रिश्ता था। मैं अपने घर में ‘गुरू’ बुलाया जाता था पर शाह साहब के घर न जाने कैसे यह ‘गुरू’ बदलकर ‘साईं’ हो गया।
और उन्हीं शाह साहब की बेटी थी सलमा।
++
वैसे, प्रतिध्वनि, फि़जि़क्स और साउंड के नियमों पर आधारित है पर मेरे लिए यह प्रारंभ से ही बहुत उत्सुकता और विस्मय का कारण रही है। प्रतिध्वनि का फैलना, सिमटना, अपनी ‘असली’ आवाज़ को ढूँढना, समय की सीमाओं से परे जाकर गूँज में बदलना - मानो आवाज़ के अनदेखे आईने में प्रतिबिंब है - प्रतिध्वनि।
आज मुझे याद नहीं कि पहली पहली बार मैंने प्रतिध्वनि को कब ‘डिस्कवर’ किया था।
बिल्कुल छोटा-सा था, पाँच छह साल का जब हमने हैदराबाद में म्युनिसिपल चढ़ाई पर नया घर लिया था। वह घर देखने के लिए जब मेरे पिताजी मुझे भी अपने साथ ले गए थे तब शायद उस बंद, ख़ाली मकान में मैंने पहली बार प्रतिध्वनि सुनी थी। इस अचानक, नई ‘डिस्कवरी’ की प्रसन्नता में मैंने बार बार चिल्ला चिल्लाकर प्रतिध्वनि सुनी थी, तालियाँ बजाईं थीं।
उसके बाद प्रतिध्वनि के मैंने अलग अलग रूप देखे, सुने हैं। पुराने गेस्ट हाऊसों में, बुलंद गुंबदों के नीचे, पहाड़ों पर - माथेरान में ‘एको प्वाइंट’ पर एक दफ़ा मैंने पटाखे जलाकर उसकी प्रतिध्वनि सुनी थी, आवाज़ों का जलते देखा था - और एक दिन ताजमहल में - लगातार सोलह सेकंड तक खिंचकर, छितर जाने वाली प्रतिध्वनि का हुस्न और पहेली - ताजमहल में मैंने देखी, सुनी, महसूस की थी।
और हाँ, हैदराबाद में मीरों के क़ुबे!
++

‘तुमने मीरों के क़ुबे’ देखे हैं?’
‘कमाल का सवाल है साईं! हमारा तो रोज़ का रास्ता है वह।’
‘वहाँ अब भी ततैया हैं?’
‘ततैया!? स्कूल से दो-एक बार भागकर, मैं मीरों के क़ुबे देखने गया था। वहाँ ततैया के छत्ते हुआ करते थे। दोनों बार मैंने डंक खाए थे। फिर कभी नहीं गया। मैंने मीरों के कु़बों में कभी प्रतिध्वनि नहीं सुनी।’
मेरे आखि़री वाक्य बोलने से पहले ही वह ठहाका लगाकर हँस पड़ी। हुमायूँ के मक़बरे के शाही दालान में सुस्ताती धूप में उसकी हँसी से कुछ गर्मी, कुछ रोशनी भर गई।
‘मीरों के मकबरों पर ताज़े खुशबूदार फूल चढ़ाए जाते हैं। ततैया अवश्य होंगे वहां। पर तुम्हें ततैया के डंक का दुख है या कु़बों में प्रतिध्वनि न सुन पाने का रंज?’
‘प्रतिध्वनि’।
‘अल्लाह! फिर भी तुम मुझ पर चिल्ला पड़े थे, साईं!’
‘वह तो... ’
‘पर मीरों के कुबों में होने वाले अनुनाद में हुमायूँ के मक़बरे या ताजमहल में होने वाले अनुनाद सा न विस्तार है, न गूँज।’
‘कहाँ मुग़ल बादशाह और कहाँ सिन्धी मीर! फ़र्क तो पड़ेगा ही ना... ’
मेरे ऐसा कहते ही एक बार फिर सलमा के चेहरे पर सब कुछ जम गया। उसकी निगाह, पेशानी पर बालों की झूलती लट की हरक़त, मुस्कान का हँसी में बदल जाने का सिलसिला, सब कुछ थम गया। फिर वही धीमी, हल्की आवाज़: ‘पर साईं, मीरों के कुबों पर हमेशा ताज़े खुशबूदार फूल होते हैं। देखो तो, यहाँ तो एक भी ततैया नहीं है!’
++

‘साईं, अंदर चलें?’
‘चलो’
भीतर एक विदेशी टोली को गाईड कुछ बता रहा था। किसी ने गाईड का ध्यान दीवार पर की गई कैलिग्राफि़कल नक्काशी की ओर खींचते पूछा, ‘यह कौन सी भाषा है?’
गाईड ने जवाब दिया, ‘पर्शियन’ 
‘हुमायूँ की भाषा?!’
‘यस सर’
‘डू यू नो पर्शियन?’
‘नो सर’
‘ऐनी बडी हियर?’
सलमा को पता नहीं क्या मज़ाक़ सूझा। बोली, ‘हुमायूँ तो सिन्धी था।’
बेचारा विदेशी उलझन में पड़ गया। कभी गाईड को देखता और कभी सलमा को। ‘सिन्धी!?’
सलमा ने कहा ‘ओ यस! सिन्धी!’
‘डू यू नो सिन्धी?’
‘ओह यस’
‘वुड यू माईंड स्पीकिंग ए सेन्टेन्स ऑर टू इन सिन्धी?’ 
'नॉट ऐट ऑल! हियर यू गो...’
बातचीत कुछ ऐसी गंभीरता और तेज़ी से आगे बढ़ चुकी थी कि मज़ाक़ कब हक़ीक़त में बदल गया, पता ही नहीं चला। गाईड अपने पेशे और ज्ञान की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त न कर सका। भड़क उठा, ‘लेडी! दिस इज़ टू मच! हुमायूँ और सिन्धी! एक टूरिस्ट को ग़लत तथ्य कैसे बता सकती हैं आप! यह एक ग़ैरजि़म्मेदाराना हरक़त है!’
सलमा कुछ कहे, इससे पहले मैं आगे बढ़ आया और सलमा को बाँह से खींचते हुए कहा, ‘प्लीज़ सलमा...’
और एक बार फिर मानो किसी जादू के असर से उसके चेहरे के सभी ख़त-औ-ख़ाल पत्थर में तराशे से हो गए, अपनी सारी गर्माइश और हर जुम्बिश खो बैठे। फिर वही शांत सी आवाज़... उस विदेशी की ओर देखते हुए, मानो आखि़री इल्तजा हो - ‘बिलीव मी। हुमायूँ सिन्धी हो, पनाह वरितल सिन्धी ऐं मुग़लेआज़म बादशाह अकबर बि सिन्धी हो।’ (विश्वास कीजिए, हुमायूँ सिन्धी था, पनाहगीर सिन्धी और मुग़लगआज़म बादशाह अकबर भी सिन्धी था) एक सेकंड विराम... ‘सिन्धी बाय बर्थ!’
विदेशी कुछ भी न समझते हुए, उलझा उलझा, हल्का मुस्कराते यहाँ वहाँ देखने लगा।
++
‘साईं, अंदर चलें?’
‘चलो’
भीतर एक विदेशी टोली को गाईड कुछ बता रहा था। किसी ने गाईड का ध्यान दीवार पर की गई कैलिग्राफि़कल नक्काशी की ओर खींचते पूछा, ‘यह कौन सी भाषा है?’
गाईड ने जवाब दिया, ‘पर्शियन’ 
‘हुमायूँ की भाषा?!’
‘यस सर’
‘डू यू नो पर्शियन?’
‘नो सर’
‘ऐनी बडी हियर?’
सलमा को पता नहीं क्या मज़ाक़ सूझा। बोली, ‘हुमायूँ तो सिन्धी था।’
बेचारा विदेशी उलझन में पड़ गया। कभी गाईड को देखता और कभी सलमा को। ‘सिन्धी!?’
सलमा ने कहा ‘ओ यस! सिन्धी!’
‘डू यू नो सिन्धी?’
‘ओह यस’
‘वुड यू माईंड स्पीकिंग ए सेन्टेन्स ऑर टू इन सिन्धी?’ 
'नॉट ऐट ऑल! हियर यू गो...’
बातचीत कुछ ऐसी गंभीरता और तेज़ी से आगे बढ़ चुकी थी कि मज़ाक़ कब हक़ीक़त में बदल गया, पता ही नहीं चला। गाईड अपने पेशे और ज्ञान की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त न कर सका। भड़क उठा, ‘लेडी! दिस इज़ टू मच! हुमायूँ और सिन्धी! एक टूरिस्ट को ग़लत तथ्य कैसे बता सकती हैं आप! यह एक ग़ैरजि़म्मेदाराना हरक़त है!’
सलमा कुछ कहे, इससे पहले मैं आगे बढ़ आया और सलमा को बाँह से खींचते हुए कहा, ‘प्लीज़ सलमा...’
और एक बार फिर मानो किसी जादू के असर से उसके चेहरे के सभी ख़त-औ-ख़ाल पत्थर में तराशे से हो गए, अपनी सारी गर्माइश और हर जुम्बिश खो बैठे। फिर वही शांत सी आवाज़... उस विदेशी की ओर देखते हुए, मानो आखि़री इल्तजा हो - ‘बिलीव मी। हुमायूँ सिन्धी हो, पनाह वरितल सिन्धी ऐं मुग़लेआज़म बादशाह अकबर बि सिन्धी हो।’ (विश्वास कीजिए, हुमायूँ सिन्धी था, पनाहगीर सिन्धी और मुग़लगआज़म बादशाह अकबर भी सिन्धी था) एक सेकंड विराम... ‘सिन्धी बाय बर्थ!’
विदेशी कुछ भी न समझते हुए, उलझा उलझा, हल्का मुस्कराते यहाँ वहाँ देखने लगा।
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‘साईं, चलें?’
‘हाँ’
आखि़री सीढ़ी के पास हम दोनों के जूते चप्पल रखे थे। मैं वहीं सीढ़ी पर बैठ जुराब पहनने लगा। मेरा दूसरा नंगा पैर ज़मीन पर ही था। सलमा अब तक नंगे पैर खड़ी थी। अचानक उसने अपने पैर की हल्की ठोकर से मेरा जूता दूर कर दिया और अपना एक पाँव, मेरे नंगे पाँव पर धर दिया। चैंककर मैंने उसकी ओर देखा। पर उसी क्षण - उसके पाँव के हल्के स्पर्श, दबाव ने मेरा ध्यान अपनी और आकर्षित किया। उसके पाँव पर हल्की लाल मिट्टी की परत लिपटी हुई थी पर हाथ से थोड़ी खींचकर ऊंची की हुई सलवार, उसके टखने से कुछ ऊपर का हिस्सा नुमायां कर रही थी, जो हुमायूँ के मक़बरे के लाल रंग का नहीं था! ताजमहल सा था - संगमरमर की सफ़ेदी और नूर। शीत और उष्ण। इसी बीच विजयी उत्साह से हँसती हुई सलमा बोली -
‘क्या सोच रहे हो साईं?’
‘अरे बाबा, कुछ नहीं।’
उसने पाँव की तरफ़ इशारा किया। ‘इसका मतलब जानते हो ना?’
‘नहीं।’
‘कमाल हो तुम भी! अपनी शादी की रीति-रस्मों से भी अनजान हो!’
‘शादी की रस्म!’
‘आप लोगों में शादी में ऐसा होता है। फेंरों के बाद दूल्हे का जूता ग़ायब कर देना, दूल्हा दुल्हन का एक साथ एक थाल में पाँव रखना और यह विश्वास कि जिसका पैर ऊपर होगा, घर पर उसी का हुक्म चलेगा।’
‘नहीं, मैं तो यह सब नहीं जानता। मेरे विवाह में ऐसा कुछ नहीं हुआ था।’
‘उसने धीमे धीमे अपना पैर हटा लिया। एक पल रूकी रही। फिर मेरे पास ही आखि़री पायदान पर बैठ गई। 
‘अच्छा, किसी ने ‘लाडे’ (ब्याह के गीत) गाए थे, तुम्हारी शादी में?’
‘नहीं’
‘अच्छा... घर में हुक्म किसका चलता है?’
मैं हँस पड़ा। कहा, ‘छोड़ो घर को, फि़लहाल तो तुम्हारा पैर था, मेरे पैर पर। चलाओ हुक्म।’
उस की आँखों के तारे, तारों का नूर, नूर की निगाह, निगाह के रिश्ते-नाते सब सर्द हो गए।
‘मेरा हुक्म चले न साईं, तो मैं तुम्हें ततैया से डंकवाऊं।’
इस आकस्मिक चोट का दर्द छुपाने के लिए मैं हँस दिया। बोला, ‘ततैया की क्या ज़रूरत है? तुम काफ़ी नहीं क्या?’
वह उसी धुन में कहती रही, ‘उसके लिए असली फूल चाहिए होते हैं।’
‘पर सलमा, इतिहास मुझसे अधिक बलवान है।’
‘ऐसा! तो फिर... भला...’
बात को आधे में छोड़ उसने अपने पर्स से टूरिज़्म डिपार्टमेंट का छपवाया हुआ, दिल्ली की पर्यटक जानकारी देने वाला ब्रोशर निकाला। और अपनी बात को दोहराया, ‘तो फिर भला इसमें तुम्हारा जि़क्र क्यों नहीं है?!’
‘मतलब’?
‘और सभी ऐतिहासिक खंडहरों का उल्लेख तो है इसमें...’
‘खंडहरों का ही उल्लेख है, इसीलिए तो...’
‘खंडहर में, सुनसान जगह में, शून्य में ही प्रतिध्वनि होती है न, साईं। मैं तुम में सिर्फ़ प्रतिध्वनि सुन रही हूँ। तुम्हारी असली आवाज़ कहाँ गुम हो गई है साईं?’

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मीर -  मीर टालपुर वंश, सिंध के आख़िरी स्थानीय शासक थे जिन्होंने ई. सन. 1783 से  1843  तक सिंध पर शासन किया. १८४३ में अंग्रेजों ने मियाणी के युद्ध में मीरों को हराकर सिंध पर कब्ज़ा किया था. 
कुबा - मक़बरा

अनुवाद : विम्मी सदारंगानी 

गुनो सामताणी (भारत) - सुप्रसिद्ध सिंधी लेखक। जन्म 14 जुलाई 1933 हैदराबाद सिन्ध में। देहांत 16 अगस्त 1996, मुंबई में। सिन्धी कहानी को संवेदनशील रूप देने में मुख्य भूमिका। अधिक नहीं, उमदा रचनाएं। तीन प्रकाशित पुस्तकें - ‘वापस’ (उपन्यास), ‘अपराजिता’ और ‘अभिमान’ (कहानी संग्रह)। प्रथम पुस्तक ‘अपराजिता’ पर 1972 का साहित्य अकादमी पुरस्कार। 



Saturday, 9 June 2012

विम्मी (Vimmi) की एक कविता

'In search of identity' bashukriya Shubnum Gill.



कितनी औरतें जीती हैं मुझमें!


अचानक एक दोपहर
धूल खाए पुराने रेडियो पर
‘वक़्त ने किया क्या हसीन सितम,
तुम रहे न तुम, हम रहे न हम’ 
सुनने की इच्छा होती है.
उस  वक़्त यह गीत माँ सुन रही होती है।


आधी रात को उठकर बिना कपड़े उतारे
शावर के नीचे खड़ी हो जाती हूँ
बदन सुखाए बिना आकर लेट जाती हूँ
तब पलंग पर बुआ करवट ले रही होती है।

पंद्रह साल पुरानी लाल साड़ी 
संदूक से निकालकर उलटने-पलटने लगती हूँ
ज़िन्दगी की तरह उसको भी 
तह लगाकर वापस उसी जगह रख देती हूँ
साड़ी को निहारती
काली पड़ गई ज़री-सी वे आँखें मौसी की हैं।

लहसुन की कलियों को दरदराते हुए
दस्ता मेरे हाथ से छूट जाता है
दूर कहीं
नानी की सास की दहाड़ गूँज उठती है
वे कँपकँपाते हाथ पाँव नानी के हैं। 

अब समझ आता है मुझे 
इतने बरसों से यूँ ही बेचैन नहीं हूँ मैं
यूँ ही ऐब्नाॅर्मल नहीं दिखती सबको
किसी एक का नहीं, इतनी सारी औरतों का साया है मुझ पर।


Wednesday, 30 May 2012

एक बैत 'ससुई पुन्हूं' से - शाह अब्दुललतीफ़


Sassi by Rahman Chughtai Sahab.


ससुई-पुन्हूं

     ससुई, शाह साहब को बेहद प्रिय है। ‘शाह जो रिसालो’ के तीस सुरों (राग-अध्याय) में से पाँच सुर - ससुई आबरी, माज़ूरी, देसी, कोहियारी और हुसैनी, ससुई पुन्हूं के लिए हैं।  इन सुरों से चुने हुए बैत आपको पढ़वाती रहूँगी।  ससुई के प्रेम और दर्द को जैसे शाह साहिब ने आखा है, वह लाजवाब है.   ससुई-पुन्हूं की कहानी अतिसंक्षिप्त में -

     ब्राहमण परिवार में जन्मी एक प्यारी बच्ची के पिता को जब ज्ञात होता है कि बड़ी होने पर उसका विवाह एक मुसलमान से लिखा है तो वह उसे एक संदूकची में बंद करके दरिया में बहा देता है। यह संदूकची शहर भंभोर के मुहम्मद धोबी को मिलती है जो इस प्यारी सी बच्ची को खु़दा का दिया तोहफा मान अपनी बेटी क़बूल करता है। बच्ची की सुंदरता देख उसका नाम रखा जाता है, ‘ससुई’ अर्थात् ‘शशि’ यानि ‘चाँद’। 
     केच मकरान से आए इत्र, सुगंध के युवा व्यापारी पुन्हूं की प्रेम-कस्तूरी का जादू ससुई के मन में रच-बस जाता है। ससुई को पाने के लिए पुन्हूं स्वंय को धोबी भी साबित करता है और इस तरह ससुई और पुन्हूं का ब्याह होता है। पर यह ख़बर जब पुन्हूं के पिता आरी जाम तक पहुँचती है तो वह अपने अन्य तीन बेटों को भंभोर रवाना करता है ताकि वे पुन्हूं को वापस ले आएं। 
     भंभोर पहुँचने पर उनका धामधूम से स्वागत होता है। मजलिस सजती है और उसी रात जश्न में मग्न पुन्हूं को उसके भाई ऊंट पर बिठाकर ले जाते हैं। सुबह नींद से जागी ससुई के पास जुदाई और दर्द के सिवा कुछ नहीं होता। अपने सजन पुन्हूं को फिर से पाने के लिए ससुई घर से अकेली नंगे पाँव निकल पड़ती है। बयाबान जंगल, पर्बत भटकती ससुई की वेदना और पुन्हूं को पाने की तड़प को शाह लतीफ़ ने बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। जब एक चरवाहा ससुई पर बुरी नज़र डालता है तो ससुई की अस्मत बचाने के लिए, धरती उसे अपनी गोद में समा लेती है। यह चमत्कार देख वह चरवाहा पश्चाताप करता है और ससुई की कब्र बनाकर, खुद उसका मुजाविर बन जाता है।
     अपने पिता और भाईयों से लड़-झगड़कर पुन्हूं भी ससुई की ओर ही चला आ रहा था। रास्ते में जब इस कब्र के पास रूकता है और मुजाविर से सारा घटनाक्रम जानता है तो वह भी ससुई से मिलने के लिए बिनती करता है। कहते हैं कि वही पर्बत पुन्हूं को भी स्वयं में समा लेता है और इस तरह ससुई और पुन्हूं का मिलन होता है। 

     पुन्हूं को पाने के लिए रोती, भटकती ससुई से शाह साहब कहते हैं - 

          होतु तुहिंजे हंज में, पुछीं कोहु पही ?
         वफ़ी अन्फ़स्कुम, अफ़लात्बिसुरून, सूझे करि सही 
         कहिं कान वही, होतु गोलण हट ते।


हिंदी अनुवाद :
         प्रियतम तेरे पहलू में हैं, 
         तेरे भीतर हैं, 
         और तू उनका रास्ता पूछती है!
         उनकी निशानियाँ तो तुझ में ही समाई हैं।
         ज़रा अपने मन में तो झाँक!
          पगली! भला अपने प्रिय को खोजने कोई हाट जाता है क्या?

                            - पाँचवीं दास्तान, सुर ससुई आबरी, शाह जो रिसालो
                              सिन्धी सूफ़ी कवि शाह अब्दुललतीफ़ भिटाई (1689-1752)

(अनुवाद: विम्मी सदारंगानी)


पुनश्च : यदि आप चुगताई साहब के प्रशंसक हैं तो उनकी अन्य कृतियाँ यहाँ देखें - http://www.chughtaimuseum.com/main.php

Saturday, 26 May 2012

कृष्ण राही की कविता


यह कविता अनुवाद कर, कृष्ण राही जी का परिचय टाईप करने लगी तब ध्यान गया कि आज ही उनका जन्मदिन भी है...  यह कविता उन्हें याद करते.. 

वोट : कृष्ण राही


photo courtesy : Indian Institute of Sindhology, Adipur

मेरा एक वोट है।

वोट, जो मेरा है
एक हक़ है
एक आवाज़ है
एक हथियार है
एक ताक़त है
एक मिल्कियत है।
मेरे पास मेरा एक वोट है।

यह वोट
मेरा है, ऐसे
जैसे मेरा नाम
जिसका फ़ायदा 
मैं नहीं, कोई और ले सके!

यह वोट
मेरा हक़ है, 
वह, जो मुझ से नाहक़  
मेरे अन्य हक़ भी छीनता रहे!

यह वोट
मेरी आवाज़ है, 
वह जो मुझे नहीं, 
किसी और को उठानी है!

यह वोट
मेरा हथियार है,
वह, जो मुझ पर वार करे!

यह वोट
मेरी ताक़त है। 
वह, जो मुझ पर हुकुमरानी करे!

यह वोट
मेरी मिल्कियत है, 
वह, जो किसी और को देने के लिए है।

वोट देना 
एक अक्लमंद की बेवकू़फ़ी है
और वोट न देना
एक बेवकूफ़ की अक्लमंदी है।

जानता हूँ 
कि इन्सान एक ही वक़्त 
अक्लमंद और बेवक़ूफ़ नहीं हो सकता।

पर देखता हूँ कि
चुनाव के समय
इन्सान 
एक ही समय
अक्लमंद और बेवक़ूफ़ होता है।

(अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)

कृष्ण वछाणी ‘राही‘ (भारत): जन्म 25 मई 1932 को लाड़काणा सिन्ध - देहांत 2007 में मुंबई में। वरिष्ठ कवि-आलोचक। काव्य संग्रह ‘कुमाच’ (1969) पर 1971 में साहित्य अकादमी ईनाम परंपरागत सिन्धी काव्य रूपों के साथ नई कविता भी। राही, प्रेम और व्यंग्य के कवि हैं।


Sunday, 20 May 2012

मुंबई - श्याम जयसिंघाणी (Shyam Jaisinghani) की



‘मुंबई मुंहिंजी’ (मेरी मुंबई) से दो दर्ज़न मुंबई.. 


  'मुंबई किसकी'. साभार  Sushobhit Saktawat 


किसी ख़ास शहर, नगर, स्थान को केंद्र में रखकर कई कवियों ने रचनाएं की हैं - जेम्स जाइस (डब्लिन), बोदलिअर (पेरिस), इलियट (लंदन) और काफ़्का (प्राग)। सभी का स्थान विशेष से ख़ास लगाव, जुड़ाव, अपनापन,  शिकायतें, उलाहने हैं।

सिन्धी में इस तर्ज़ पर श्याम जयसिंघाणी के दो काव्य संग्रह हैं -  गोवा पर लिखा हुआ ‘गोवानी मंज़र’ और मुंबई पर रचा हुआ ‘मुंबई मुंहिंजी’। सोचा यह था कि ‘मुंबई मुंहिंजी’ (मेरी मुंबई) पर कुछ लिखूंगी पर जब श्याम की मुंबई की गलियों में भटकी और समुद्र किनारे बैठी; अंधेरों के व्यापार को जाना; चोर बाज़ार में तांकाझांकी की; आमने सामने खड़े गेट वे ऑफ  इंडिया और ताज को देखा; ट्राम के साथ साथ दौड़ी; लोनली क्राईस्ट के दर्द को अपने भीतर पाया किया; ईरानी रेस्तोरां की कड़क चाय का मज़ा लिया; राजकपूर, शम्मी कपूर और पृथ्वीवाला की चकाचैंध देखी; भारत की आज़ादी के बाद शरणार्थी बनकर आए सिन्धियों को मिलिट्री कैंप में मरते जीते देखा; लड़खड़ाती चॉल  में काँपती मंजि़लों का डर अपनी टांगों में रेंगता सा लगा... तो बस, वहीं रूक गई। और आखि़र में दिखा इस महानगर में अपना घर तलाशता इंसान...

कविता संग्रह की शुरूआत में है ‘कविता के आँगन में दाखि़ल होने से पहले’. उस में अंकित श्याम जयसिंघानी के शब्दों को ज्यों का त्यों रख रही हूँ,  बेशक अनुवाद के ज़रिए -

‘आधी सदी पहले कोयला ढोते, मैंने सरहद पार की
आधी सदी मैंने इस मुकद्दस ज़मीन पर गुज़ारी है
यक़ीनन इस ज़मीन ने मुझे गोद लेकर अपनाया है।

मेरे इस कविता संग्रह का पहला हिस्सा ‘मुंबई मेरी’ मेरी अक़ीदत का आईना है। पचास साल - पचास पन्नों में, एक सौ पचास हिस्सों में।

आसपास का माहौल, ज़िन्दगी,  कल्चर, मंज़र,
रवायतें, खुशबुएँ, यादों में वे साथी और वे पल!

शहर बोलते हैं, सुनते हैं, देखते हैं।

पचास साल मैंने मुंबई के गली कूचों, पेड़ों की परछाईं में लेटकर, गर्म फ़ुटपाथ पर, उदास समुद्री किनारे, सुनहरी सूरज के ढलने पर उड़ जाते रंगों को ज़हन में समेटते हुए, लोकल ट्रेन की दम घुटती भीड़ में अपनी साँसें संभालते हुए... कई अक्सों, कई अहसासों, कई साथ छोड़ते रिश्तों, साथ देते पलों के साथ वर्ज़िश करते बिताए हैं।’’

मुंबई की इन तस्वीरों पर स्याही बिखेरने के बजाय चाहा कि आप भी कुछ तस्वीरें देखें। हो सकता है, इनमें से किसी में आप भी हों... 

1. नरीमन प्वांइट
समुद्र में सरकते फिसलते पत्थरों पर
माचीसी घरों के तृषत जवान जोड़े
तीलियों की भाँति एक दूसरे से चिपके, गीले।

2. क्रॉस मैदान
तपती दुपहरी में क्रिकेट प्रैक्टिस
हर नई बॉल, जैसे ताज़ा जन्मा सपना
वाडेकर, गावस्कर, तेंदुलकर।

3. चौपाटी 
बंबई का भूतकाल अरबी समुद्र में समाया
‘क्वीन्ज़ नेकलेस’ की चमक में पिरोया वह
पृष्ठभूमि में गंदगी, मक्खियां, बदबू और कचरा।

४. गेट वे ऑफ इंडिया (समंदर से)
ताज होटल की आसमानी ऊंचाई
‘गुलीवर’ के बौने-सा दिखता गेट वे
शेख़ मुख़्तार के साथ खड़ा मुकरी जैसे।
(शेख मुख़्तार: पुरानी हिन्दी फि़ल्मों का कदावर नायक। मुकरी: छोटे क़द का लोकप्रिय के कॉमेडियन)

५. अंधेरों का व्यापार
म्यूजि़यम के सामने सुनसान अंधेरे फ़ुटपाथ
‘सदा सुहागिनों’ के खनकते कंगन
वाकई, ‘सिटी लिव्ज़ इन हर प्राॅस्टीट्यूट्स’।*
* वर्जीनिया वूल्फ़

६. चोर बाज़ार
जगमोहन, के सी डे, पंकज मलिक
रिकॉर्ड पुराने, बेशकीमती तवारीख़ी ख़ज़ाने
चुराए हुए, त्यागे हुए, लावारिस, अनमोल।

७. ग्लोरिया चर्च
फ़्लाइ ओवर से उतरती चढ़ती बस  
अक्सर बाँहें फैलाए खड़ा दिखता क्राईस्ट
एक अहसास: हाउ लोनली ही इज़।

८. ट्राम सवारी
माटुंगा से म्यूजि़यम तक एक आने की टिकट
डबल डेकर की तख़्त-ए-ताऊसी सीट
शरत बाबू का नॉवेल और मूंगफली का ऐश।

९. आखि़री ट्राम
न फूल, न हार, न चंदन, न धूप, न ही गुलाल
31 मार्च 1964, आखि़री ट्राम बोरीबंदर-दादर
राह में अंतिम यात्रा की गवाह लोगों की क़तार।

१०. ईरानी रेस्तराँ - एक 
‘साब का ब्रेन फ्राइ करो’
‘मेमसाब का आमलेट बनाओ’
‘ख़ान को कड़क चाय मारो’।

११. ईरानी रेस्तराँ - दो 
‘सिंगल  ऑमलेट, बन मस्का, कम पानी चाय’
अख़बार पढ़ा, सिगरेट पिया, लिखी कविता
बाज़ी खेली शतरंज की, पास बैठे पारसी के साथ।

१२. सदाबहार मौसम
‘राउंड दि क्लॉक,  हमारा ‘अंडर वर्ल्ड’ जागे
ज़ेर ज़मीन उजाला, सोया सिपाही, थका कुत्ता
सुपारियों की लेन-देन, हाथ बदले-सदले।
(ज़ेर ज़मीन - ज़मीन के नीचे)

१३. काला घोड़ा
अमलतास के झरते पत्ते और काँपती डालियाँ
रिदम हाउस, चेतना,  काॅपर चिमनी, वे साइड इन
आर्ट गैलरीज़, लाइब्रेरी, घोड़ा मगर गुम।

१४. कल्याण कैम्प: 1948
मरी हुई सी, कमज़ोर, बदरंग मिलिट्री कैम्प्स में
दुत्कारे हुए, भूखे, पनाहगीर भरे गए हैं जहाँ तहाँ
मुफ़्त राशन बिजली, क्लेम्स के लिए कैम्प कमांडर।

१५. जापानी बाज़ार
हर तरफ़ शोरगुल, लेनदेन का धंधा
सूरज निकले, लक्ष्मी जागे, सिक्का घूमे गोल
कि़स्मतवाली रात है, मेहनतकशों का भरे झोल।

१६. हाजी अली
बुख़ारा से आया एक पीर, हाजी
बेख़ुदी में समंदर में उतर गया
हमेशा दमकते क्षीरसागर में बदल गया।

१७. ओपेरा हाउस
न कोरस, न  ओपेरा , न ही कोरल गान
गूंगी फि़ल्म की दास्तान सुनाते सुनाते 
बूढ़ा, आखि़री सांसें, बेदम और बेआवाज़।

१८. सेनोरिटा
थिएटर सोचें, थिएटर खेलें, थिएटर ही जियें
पृथ्वीराज, शेक्सपियरवाला, जेनिफ़र, संजना
मुंबई थिएटर के जुनूनी, खट्टे-मीठे अनारदाने।

१९. शम्मी
फि़ल्मी दुनिया में एक अजब चमत्कार
मरे हुए रोमांस में एक अनोखा सैलाब
‘याहू’, बेक़ाबू, बिना किसी नक़ाब।

२०. जाने कहाँ गए वो दिन
फटा जापानी जूता, रूसी टोपी, हिन्दुस्तानी दिल
‘दाल में  काकरोच है’, जीना यहाँ मरना यहाँ
ज़िन्दगी में उसने रोमांस भरा, रोमांस में अपनी जान।



२१. तलाश 
पुराने, इस्तरी किए, सिलेटी फुल सूट में
बंद छतरी उठाए, झूमता झामता, बूढ़ा पारसी
ख़ुद ही को सुनने, आसमान से बतियाए।

२२. आदमशुमारी
तुम बस स्टॉप पर खड़े केला खा रहे हो
कौन है जो तुम्हारी शर्ट खींचता है
अधनंगा, मगर पूरा भूखा, अपना हिस्सा मांगता है।

२३. कमज़ोर चॉल 
झुकी हुई, लोगों से ठसाठस सथी 
बेशुमार स्तंभों थंभो पर खड़े कमरे
पठाखों की आवाज़ से मंजि़लें काँप जाती। 

२४. ख़ानाबदोश 
नाम है, पता है, फ़ोन नंबर भी है
पनाह के लिए छत, दीवारों वाला मकान भी है
सब कुछ है दोस्तों, सिर्फ़ घर नहीं है... 

यह है श्याम की मुंबई, सबकी मुंबई....

(अनुवाद : विम्मी सदारंगानी) 

Photo courtesy sindhology.org

श्याम जयसिंघानी (भारत) : 12 फ़रवरी 1937 को क्वेटा, बलूचिस्तान में जन्म। कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, आलोचक। 1995 में मराठी उपन्यास ‘चानी’ पर साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार। 1998 में एकांकी संग्रह ‘जि़लजि़लो’ पर साहित्य अकादमी अवार्ड। 




Thursday, 17 May 2012

सूफ़ी कवि शाह अब्दुललतीफ़ भिटाई - दो प्रसंग


शाह लतीफ़ (1689-1752) की सभी तस्वीरें काल्पनिक ही हैं। अब तक उनकी सच्ची मौलिक  तस्वीर प्राप्त नहीं हो सकी है। शाह लतीफ़, मझौले क़द से कुछ लंबे होंगे,  चौड़े  कंधे, शरीर न अधिक भरा हुआ, न अधिक दुबला पतला। रंग गेहुँआ, बाल काले सुनहले से और बड़ी बड़ी काली आँखें।  


शाह लतीफ़ की कुछ और काल्पनिक तसवीरें देखने के लिए कुछ इंतज़ार करना होगा :)


1. सूआ, पालक, चूका 

सूफ़ी कवि शाह अब्दुललतीफ़ भिटाई ने एक बार अपने एक मुरीद से पूछा - ‘बाहर यह आवाज़ कैसी है?’
मुरीद ने जवाब दिया - ‘कि़बला! सब्ज़ी वाला बाकरी है।’
शाह लतीफ़ ने दूसरा सवाल किया - ‘क्या हाँक लगाता है? क्या बेच रहा है?’
मुरीद बोला - साईं, वह कहता है, ‘सूआ, पालक, चूका...’
शाह ने उत्तर दिया - ‘बिल्कुल सही कहता है वह। सूआ, पालक, चूका... जो पलक सोया (एक पल भी सोया), सो चूक गया।’



2. कुछ नहीं

किसी शाह लतीफ़ से सवाल किया - शाह साईं! आप सुन्नी हैं या शिया?’
शाह लतीफ़ ने मुस्कुराकर कहा - ‘मैं दोनों के बीच में हूँ।’
वह शख़्स आश्चर्य से बोला - ‘पर साईं! दोनों के बीच तो कुछ भी नहीं है।’
शाह लतीफ़ ने उसी मुस्कान से कहा - ‘बिल्कुल। मैं भी कुछ भी नहीं हूँ।’


Tuesday, 15 May 2012

शहर से वह लौटा था... मोती प्रकाश (Moti Prakash) की ग़ज़ल




आज सुप्रसिद्ध सिन्धी कवि मोती प्रकाश का जन्म दिन है। उनके कई कविता संग्रह, रेखाचित्र और निबंध प्रकाशित हैं। ऐसा माना जाता है कि अगर मोती प्रकाश ने  और कुछ न भी लिखा होता तो भी उनका एक ही गीत ‘आँधीअ में जोति जगाइण वारा सिन्धी’ उनको सिन्धी जगत में यह प्रतिष्ठा प्रदान करने के लिए काफ़ी था। 1947 के बाद भारत में पुनः जीवन प्रारंभ करने के कठिन दौर में इस गीत ने सिन्धी जाति को बहुत प्रेरणा और बल दिया। इस गीत को सिन्धी क़ौमी गीत का दर्जा प्राप्त है..
आज उनकी एक ग़ज़ल.. 

ग़ज़ल : मोती प्रकाश 

कई बरसों बाद दिया जला था
शहर से वह शायद घर लौटा था। 

लेकर लौह शरीर चला था घर से वह 
पिघले ज्यों मोम, धूप में वह घुला था।

मतवाला जवान निकला था गाँव से
बन बुज़ुर्ग, दुल्हन का वर लौटा था।

अपनी झोंपड़ी का अता-पता पूछा जब
बोले इस उम्र में आकर दिमाग़ फिरा था।

हर कोई हँसा था उसकी सादगी पर,
था समझदार पर पगला सा लगा था।


(अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)

मोती प्रकाश (भारत): जन्म 15 मई 1931 सिन्ध के गाँव दड़ो, जि़ल ठट्टा में। कवि, निबंध लेखक, नाटककार, अदाकार। 1989 में सिन्ध के यात्रा वृतांत ‘से सभु सांढियम साह सीं’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार। 1977 से 2006 तक दुबई इंडियन हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक। वर्तमान में इंडियन इंस्टीट्यूट  ऑफ सिन्धालाजी,  आदिपुर से जुड़े हुए हैं।

मोती प्रकाश जी के विस्तृत परिचय और मेनका शिवदासानी से उनकी बातचीत का अंश पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक को क्लिक कीजिये :



Monday, 14 May 2012

हर माँ की ज़बान काट दो.. वासुदेव मोही (Vasdev Mohi) की कविता


विश्व में छह हज़ार से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं। एक अनुमान है कि अगली सदी तक आधी भाषाएं मृत्यु के कग़ार पर होंगी। भारत में भी कई भाषाएं घरों से, मोहल्लों से, स्कूलों से, दफ़्तरों से, हाट बाज़ारों से, ज़बानों से, दिलों से मिटती जा रही हैं। वासुदेव मोही को भी अपनी मातृभाषा के गुम होने का भय है, उसका ख़ून हो जाने का भय है... 



Poster courtesy UNESCO (The Courier, 2009. Number 2)








ख़ून

यह आम खू़न नहीं है.
आम ख़ून आसान है.
इस ख़ून के लिए
पहले हर माँ की ज़बान काट दो  
माँ की बोली का एक भी शब्द
किसी भी बच्चे के कानों में न घुले.
फिर हर पिता के आगे
अन्य अहम भाषाओं के ख़ज़ाने खोल दो
ऊंचे ओहदों की फ़हरिस्त बनाकर 
उस भाषा से जोड़ दो.
तुरंत रसूख़ चलाकर
आकाशवाणी, दूरदर्शन से
प्रसारित होने वाले इस भाषा के सभी कार्यक्रम बंद करा दो.
स्कूलों का ख़ास ध्यान रखना
भाषा का एक भी स्कूल चलना नहीं चाहिए.
विषय के तौर पर भी इस बोली को नाकारा घोषित कर दो
और किताबों का छपना ग़ैरक़ानूनी.
पूर्व प्रकाशित पुस्तकें दीमक के भरोसे न छोड़ी जाएँ.
माचिस की एक तीली अधिक ताक़तवर है.
गायक वगै़रह जुनूनी होते हैं
देखना, वे खु़श रहें
अन्य भाषाओं के गीत गाते रहें
और गाते रहें।
हाँ, इस सबके बाद तुम्हें लगेगा
कि इस भाषा का हर फ़र्द
उस ऊंट के जैसा है
जो रेगिस्तान में
फैले हुए विशाल रेगिस्तान में
अकेला है
रस्ता भूल गया है
और उसके गले की घंटी भी गुम हो गई है।

(अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)


वासुदेव सिधनानी ‘मोही’ (अहमदाबाद, भारत): जन्म 2 मार्च 1944 को मीरपुर ख़ास, सिन्ध में। प्रकाशित कविता संग्रह - तज़ाद 1976, सुबुह किथे आहे 1983, मणकू 1992, बर्फ़ जो ठहियल 1996, चुहिंब में कखु 2001, रेल जी पटरी मेरी (मैली) 2009. ‘बर्फ़ जो ठहियल’ पर 1999 में साहित्य अकादमी ईनाम। वर्तमान में साहित्य अकादमी की सिन्धी सलाहकार कमेटी के कन्वीनर।

Saturday, 12 May 2012

सूफी कवि सचल सरमस्त (Sachal Sarmast) की एक रचना..



काफ़ी : सिन्धी सूफी कवि सचल सरमस्त 

अब्दुल वहाब (१७३९-१८२६) का नाम पड़ा 'सचल सरमस्त', उनके सच कहने, धर्म के ठेकेदारों से न डरने के कारण.. सचल जब सिर्फ १३ साल के थे, महान सूफी कवि शाह अब्दुल लतीफ़ का उनसे मिलना हुआ और देखते ही उन्होंने कहा, ''हमने जो देगची चढ़ाई है, उसका ढक्कन यह बालक उतारेगा'' अर्थात जो बातें हमने ढके छुपे ढंग से कहीं हैं, उन्हें ये ऊंची आवाज़ में कहेगा, निडर होकर.. सचल, सत्य और प्रेम के पुजारी हैं मगर उनकी पूजा पूजा, माला और मनके वाली नहीं है.. वे तो क्रांतिकारी कवि हैं, गलत परम्पराओं, धर्म के ढकोसलों के खिलाफ सख्त आवाज़ उठाने वाले.. उनका कहना है, 'मजहबों ने मनुष्य को उलझाया, अक्ल की बात करने वाला इश्क के नजदीक न पहुँच पाया'.. सचल की काफ़ियों (काव्य रूप) में अध्यात्म, श्रृंगार और प्रेम का संगम है. सचल को 'शाइर-ए-हफ्त ज़बान' कहा जाता है क्योंकि वे सात भाषाओं (सिन्धी, अरबी, सिराइकी, पंजाबी, उर्दू, पर्शियन और बलोची) में कलाम कहते थे..














मुल्ला मार न  तू , साजन देखूं या सबक़ पढ़ूँ? 
यार ने हमको 'अलिफ़' पढ़ाया,
'बे' की बात ना कर तू,
साजन देखूं या सबक़ पढ़ूँ? 
शाह दराज़न, सचल बसता,
मन का मरहम तू..
साजन देखूं या सबक़ पढ़ूँ? 
मुल्ला मार न  तू .


(सचल का कलाम, सुर तलंग)


(सिन्धी से अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)