Saturday, 12 May 2012

सूफी कवि सचल सरमस्त (Sachal Sarmast) की एक रचना..



काफ़ी : सिन्धी सूफी कवि सचल सरमस्त 

अब्दुल वहाब (१७३९-१८२६) का नाम पड़ा 'सचल सरमस्त', उनके सच कहने, धर्म के ठेकेदारों से न डरने के कारण.. सचल जब सिर्फ १३ साल के थे, महान सूफी कवि शाह अब्दुल लतीफ़ का उनसे मिलना हुआ और देखते ही उन्होंने कहा, ''हमने जो देगची चढ़ाई है, उसका ढक्कन यह बालक उतारेगा'' अर्थात जो बातें हमने ढके छुपे ढंग से कहीं हैं, उन्हें ये ऊंची आवाज़ में कहेगा, निडर होकर.. सचल, सत्य और प्रेम के पुजारी हैं मगर उनकी पूजा पूजा, माला और मनके वाली नहीं है.. वे तो क्रांतिकारी कवि हैं, गलत परम्पराओं, धर्म के ढकोसलों के खिलाफ सख्त आवाज़ उठाने वाले.. उनका कहना है, 'मजहबों ने मनुष्य को उलझाया, अक्ल की बात करने वाला इश्क के नजदीक न पहुँच पाया'.. सचल की काफ़ियों (काव्य रूप) में अध्यात्म, श्रृंगार और प्रेम का संगम है. सचल को 'शाइर-ए-हफ्त ज़बान' कहा जाता है क्योंकि वे सात भाषाओं (सिन्धी, अरबी, सिराइकी, पंजाबी, उर्दू, पर्शियन और बलोची) में कलाम कहते थे..














मुल्ला मार न  तू , साजन देखूं या सबक़ पढ़ूँ? 
यार ने हमको 'अलिफ़' पढ़ाया,
'बे' की बात ना कर तू,
साजन देखूं या सबक़ पढ़ूँ? 
शाह दराज़न, सचल बसता,
मन का मरहम तू..
साजन देखूं या सबक़ पढ़ूँ? 
मुल्ला मार न  तू .. 


(सचल का कलाम, सुर तलंग)


(सिन्धी से अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)




Friday, 11 May 2012

मंटो के जन्मदिन पर..



मंटो, सकीना और हेमा..









आज मंटो का सौवां जन्मदिन है.
मुझे सकीना और हेमा याद आ रही हैं.
पिछले ही हफ्ते अहमदाबाद स्टेशन पर ८-९ साल की एक बच्ची से मिलना हुआ.. मैं रेल टिकट का स्टेटस जानने के लिए कंप्यूटर स्क्रीन के सामने खड़ी थी और वह की बोर्ड पर अपना हाथ रखे हुए थी.. मैंने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, वह भी मुस्कुराई. बोली, मैं बताऊँ? मुझे अचरज हुआ.. मैला सी फ्रॉक पहने, उलझे उलझे बालों वाली यह लड़की मुझे मेरी टिकट का स्टेटस देखकर बताएगी और वह भी कंप्यूटर पर! मैंने कहा ठीक है, मैं नंबर बोलती जाती हूँ, तुम टाइप करती जाओ.. दो-तीन बार कोशिश करने पर स्टेटस पता चल गया, टिकट कन्फ़र्म हो गया था. मुझे राहत मिली और मुझे यह ख़ुशी देकर वह भी खुश थी. मैंने नाम पूछा. उसने बताया, हेमा. मैंने कहा बड़ा ही सुन्दर नाम है तो वह शर्मा गई और हँस पड़ी. मैंने उसकी होशियारी की तारीफ़ की तो बताया कि तीसरी कक्षा में पढती है. मैंने पूछा कि यहाँ प्लेटफ़ार्म पर क्या कर रही हो. तो हाथ के इशारे से क्लोक रूम की ओर प्लेटफ़ार्म की तरफ़ इशारा करके बोली, वहां रहती हूँ. मुझे आश्चर्य हुआ. मैं तो समझी थी कि शायद यह भी मेरी तरह अपनी गाड़ी के आने का इंतज़ार कर रही है. खैर, हमने सेब के जूस से अपना गला तर किया. मेरी गाड़ी आने में कई घंटे बाकी थे, बैग तो क्लोकरूम में रख दिया था पर किताबों का एक बैग भी था . मैंने स्टाल वाले से विनती की वह मेरी किताबें अपने पास रख ले, ताकि इस बीच मैं अहमदाबाद के किसी अच्छे बुक स्टोर से हो आऊं. दुकान वाला बोला, किताबें दिखाइये. मैंने कहा ये रहा बैग, इस लड़की के पीछे. उसने कहा मगर दिखाइए तो सही कि कितना बड़ा है. मैंने हाथ से इशारा करते हेमा से कहा, बेटा थोडा इधर होना. हेमा वहां से नहीं हटी और उसने अपनी फ्रॉक ऊपर उठा दी. एक पल को मैं जैसे कुछ समझ ही नहीं पाई कि ये क्या हुआ.. फिर मैंने एकदम से उसकी फ्रॉक नीचे खींचकर ठीक की और आसपास देखा कि कहीं कोई बुरी नज़र इस बच्ची को घूर तो नहीं रही..  हेमा की इस हरकत ने मुझे सर से लेकर पैर तक हिला दिया था, ऐसी मासूम लड़की.. ऐसी मासूम हरकत जाने अनजाने में.. या कोई और भी बात थी..  मैं उस से अधिक बात नहीं कर पाई.. उसके लिए डर गई थी. फिर भी कुछ बोल नहीं पाई सिवाय इसके कि अब तुम अपने माँ पापा के पास जाओ हेमा. इधर उधर मत घूमो. वेटिंगरूम तक आना मेरे लिए भारी हो गया.. ज़हन में हेमा थी और उस पर चेहरा मंटो की सकीना (कहानी 'खोल दो')  का था, या मुझे सकीना दिख रही थी और उसका चेहरा हेमा का था..  कुछ याद नहीं, कुछ होश नहीं...  आज जन्मदिन मंटो का है और मुझे सकीना के साथ हेमा का ख़याल भी आ रहा है.. मंटो को पता है क्या कि हेमा भी सकीना ही है.. सकीनाएं अब भी हैं.. 


Thursday, 10 May 2012

अर्जुन हासिद (Arjun Hasid) की कविता



ख़त: अर्जुन ‘हासिद’



                                    Jozef Israëls (1824-1911) Dutch Artist. शायद सेल्फ-पोर्ट्रेट 


यह ख़त
जो अब भीगकर भुरभुरा गया है
काग़ज़ का रंग भी उड़ गया है
और स्याही का भी
ठीक ऐसे ही जैसे मेरे अहसासों का।
आप शायद पढ़ न पाएं यह ख़त
पढ़ लेंगे तो भी समझ नहीं पाएंगे
वक्त  के साथ भाषा का मूल्य और मान भी तो बदल गया है ना!

अपनी वीरानियों का बयान किया है उसने
और मुझ पर बेवफ़ाई का इल्ज़ाम भी मढ़ा है
इस इल्ज़ाम को ज़िंदगी की आखि़री घड़ी तक 
देखने और समझने के लिए ही
संभाले हुए हूँ यह ख़त।

किसी जगह का ज़िक्र करते लिखा है उसने
कि उस जगह जब फिर से गए होगे
तो हमारी याद भी आई तो होगी?
मेरी याददाश्त में तो उस जगह की 
कोई पहचान ही नहीं है।
प्यार शायद छोटी छोटी बातों में ही 
खु़द को निहारता और परखता है।

मेरा उससे प्यार रहा भी है या नहीं,
उसने तो मुझे ऐसा ख़त लिखने के क़ाबिल समझा है!
इस ख़त का एक-एक शब्द याद है मुझे
इतनी बार पढ़ा है मैंने यह ख़त।
आज मेरे पोते के हाथ में है यह ख़त,
कहीं से हाथ लग गया होगा उसे
मैं निश्चिन्त हूँ
वह पढ़ नहीं पाएगा।

(अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)



अर्जुन ‘हासिद’ (भारत): जन्म 7 जनवरी 1930, कराची. हासिद साहब सिन्धी ग़ज़ल के उस्ताद शायरों में माने जाते हैं। मुख्य काव्य संग्रह - ‘पथर पथर कंडा कंडा’ 1974, ‘मेरो सिजु’ 1984, ‘मोगो’ 1992, ‘साही पटिजे’ 2006, ‘न इएं न’ 2009. ‘मेरो सिजु’ (मैला सूरज) पर साहित्य अकादमी पुरस्कार। हासिद की गज़लों की विषेषता है उनके विषय और भाषा शैली। 



अर्जुन ‘हासिद’ की तस्वीर:  http://www.encyclopediasindhiana.org से साभार 

Wednesday, 9 May 2012

पुष्पा वल्लभ की कविता




कोल्हन : पुष्पा वल्लभ






प्राचीन काल की मैं कोई हस्ती हूँ .

मेरा मन 

मोहेंजोदड़ो की प्रतिमा. 

मैं ही हूँ वह नर्तकी

जिसके नृत्य करते हाथ हैं 

दो सफ़ेद उड़ते कबूतरों जैसे.


मेरी पायल की छन छन से

मंदिर की घंटियाँ जाग जायें,

आसमान में मुखड़ा दिखलाए सूरज

दुनिया में सुबह का पयाम हूँ मैं..


मैं ही लक्ष्मी, मैं ही सरस्वती 

मैं ही दुर्गा हूँ .

सच पूछें तो 

अन्याय के भूत का विनाश करने वाली

मैं ही काली हूँ.

पूजी केवल मंदिरों में जाती हूँ

बाहर तो बस रास्ते की धूल हूँ.

रात की काली चादर

और दिन का चूल्हा चौका हूँ मैं.



मैं!

सफ़ेद कपड़े, साफा,

जूते, कोट पहने हुए 

इस आदमी के पीछे पीछे 

बंधेज का घाघरा और 

गुलाबी चुनरी ओढ़े 

नंगे पैर चलती

मैं कोल्हन हूँ !


(सिन्धी से अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)

पेंटिंग 'fisher woman' के लिए स्वाति रॉय जी का आभार.  



पुष्पा वल्लभ (सिंध) :  १५ जनवरी १९६३ को थरपारकर  में जन्म. बायोमेडिकल कॉलेज, कराची के माइक्रो-बायोलाजी विभाग में व्याख्याता. सिंध के सुप्रसिद्ध लेखक और अनुवादक वलीराम वल्लभ की सुपुत्री.  प्रकाशित कविता संग्रह - 'दरी-अ खां बाहिर' (खिड़की से बाहर) १९८५ और 'बंद अखियुन में आसमान' (बंद आँखों में आसमान) २०१०.


Tuesday, 8 May 2012

सुगन आहूजा (Sugan Ahuja) का सॉनेट


माँ और बेटा : सुगन आहूजा 

माँ और बेटे के प्यार के बीच पिता..  सुगन आहूजा के इस सॉनेट की लयात्मकता बनाए रखने की मैंने कोशिश की है.  









मार खाकर माँ की, बेटा एक कोने में रोता रहा
उसकी माँ को डांटकर, मैं बेटे को गया दुलारने. 
प्यार किया जैसे ही, उसने हाथ पर काट खाया
छुड़ाकर खुद को, उसी जगह बैठ लगा फिर रोने .

उसका चलन, मेरी शान में गुस्ताखी , वह सह न पाई 
जोश और गुस्से से, आकर एक चांटा उसको जड़ा.
मेरे रोकने से रुकी, झगड़ा मुझ ही से करने लगी 
माँ बेटे का यह झगड़ा, बेटा चुप देखता रहा खौफ़ज़दा.

देर से उस रात, हम सभी सोये दूर दूर अलग
कुछ आवाज़ हुई आधी रात, और मैं जाग उठा. 
सरक आया था बेटा, सोने, माँ के गले लगकर 
कि सुबकती माँ ने भी उसे कसके सीने लगा लिया.

अब मैं समझा कि माँ बेटे का अपना एक जम्हूर है
और किसी भी तीसरे का दख़ल उन्हें नामंजूर है.

(अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)


सुगन आहूजा (भारत) : १.१२.१९२१ को जन्मे सुगन आहूजा का जीवन सिर्फ चालीस वर्ष का (निधन फरवरी १९६० में) रहा पर इस छोटे से जीवन में उनकी क़लम खूब चली. उनका पहला कहानी संग्रह 'ऐश जी कीमत' १९६० में और दूसरा 'अरमान' १९६८ में प्रकाशित हुआ. एक ही काव्य संग्रह 'बे आग जलन था परवाना' १९६७ में छपा और एकमात्र उपन्यास 'कँवल जागी उथ्या' १९६८ में. नारायण श्याम की 'रूप माया' पर की गई उनकी विस्तृत आलोचना अब भी याद की जाती है. 


Sunday, 6 May 2012

इंद्र भोजवानी की कविता


तनहा :  इंद्र भोजवानी 










१. तरक्की क्रिमिनल कोड की, सभ्यता का विकास.
२. लीडर अरेस्ट, कम्प्लीट रेस्ट.
३. शेर और बकरी साथ, बिठाये मेज़ पर बच्चे ने.
४. शब्दकोश भण्डार, नैनों की भाषा कहाँ!
५. मन को मारूँ  इक चाबुक, वह मारता हज़ार.
६. आंसुओं की कद्र हो कैसे, खारा पानी हैं.
७. आसमान की स्लेट पर, युगों से वही पाठ.
8. घर में चाँद आता नहीं, दिया ही देता साथ.
९. ज़िन्दगी का टोस्ट, अभी तो है अधपका.
१०. हर गोली की आवाज़, सुनाती है 'हे राम'.

तनहा : काव्य रूप. एक पंक्ति की कविता. दोहे की १३-११ मात्रा /  बहर वज़न पर. तनहा लिखने वालों में  इंद्र भोजवानी, हरी दिलगीर और सतीश रोहरा प्रमुख. सतीश रोहरा का तनहा संग्रह 'तनहा' प्रकाशित. 

इंद्र भोजवानी (भारत) : जन्म - कराची १९१८. देहांत - अहमदाबाद १९९२. काव्य संग्रह - पिरह बाखूं कढियूं (१९६३), बिजलियूँ थियूं बरसन (१९७०). इल्म ए अरूज़ पर भी एक पुस्तक.   


तस्वीर : 'अफगानी लड़की' बशुक्रिया नेशनल ज्योग्राफ़िक. 

Saturday, 5 May 2012

हरि दरयानी 'दिलगीर' की कविता



किशिनचंद 'बेवस' और उस्ताद नवाज़ अली 'न्याज़' को अपना गुरु मानने वाले हरी दिलगीर की कविता सुखदर्सी कविता है. वे कहते हैं,  'मुझे ज़िन्दगी अच्छी लगती है..  मैं हँसते हँसते जीना चाहता हूँ. हँस हँस कर जी रहा हूँ. हँसते हँसते जीना मेरे लिए राह भी है और मंजिल भी... मैं ज़िन्दगी को उसके सुन्दर स्वरुप में देखना चाहता हूँ... हालांकि कुछ साहित्यकारों में मेरे इस नज़रिए का मजाक उड़ाया. कहा कि इस दुनिया में सिर्फ दुःख ही दुःख है, सुख कुछ गिने चुने लोगों की विरासत है.. मुझे वाद विवाद पसंद नहीं, इसलिए वाद विवाद कर भी नहीं पाता... ऐसा नहीं है कि मेरी हर कविता में आशा और उजाले की चमक है. कहीं कहीं निराशा की झलक भी है, अलबता वह झलक झीनी है. पर जो भी लिखा है, उस में सच्चाई है. बिलकुल ईमानदारी से लिखा है..''  


महफ़िल : हरि दरयानी 'दिलगीर' 














कई आते हैं मिलने मुझसे 
मेरे घर रोज़ रोज़ महफ़िल है.
मैं किसी से मिलने जाऊं 
यह मेरे लिए ज़रूरी नहीं,


मेरे घर रोज़ नाच मीरा का
भजन सूरदास के, और दोहे कबीर, 
वाल्ट विटमन, ख़लील और ख़य्याम
शाह, टैगोर और सचल 
सभी आ जाते हैं मेरे बुलावे पर,


अपने ख़यालों की ख़ुश्बू से
महका देते हैं मुझे भी..

मैं भला क्यों किसी के घर जाऊं ?


(अनुवाद : विम्मी सदारंगानी)

(हरि दिलगीर जी के काव्य संग्रह 'पल पल जो परलाउ' १९७७ से)


हरि दिलगीर (भारत) : जन्म १५ जून १९१६ लाड़काना, सिंध. देहांत ११ अप्रैल २००४ आदिपुर, भारत. लगभग बीस काव्य संग्रह प्रकाशित. 'पल पल जो पर्लाऊ' पर १९७९ में साहित्य अकादमी अवार्ड. 'सीकिंग द बिलवेड' (शाह जो रिसालो) पर अंजू माखीजा के साथ २०११ का साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार.